RTI

भारत में आरटीआई की हालत खस्ता

Jan, 19 2019

साल 2005 में भारत में आरटीआई एक्ट लागू हुआ.  पिछले 14 वर्षों में आरटीआई एक्ट की वजह से स्थानिक स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक कहीं घोटाले बाहर आए.  भ्रष्टाचारियों को भागना पड़ा. 2014 लोकसभा चुनाव के वक्त आरटीआई के माध्यम से तत्कालीन कांग्रेस की सरकार के खिलाफ कई सारे डॉक्यूमेंट आम लोगों के हाथ में पहुंच चुके थे.  नतीजतन जनसामान्य के बीच में सरकार के प्रति नाराजगी पैदा हुई और भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी. लेकिन यह सरकार बनने के बाद आरटीआई एक्ट मानो मृत्यु शैया पर लेट रहा है.

आरटीआई एक्ट को काबू में करने के लिए सरकार ने कई बेहतरीन आजमाए हैं.  राज्य स्तर से लेकर केंद्रीय स्तर तक आरटीआई में पूछे गए सवालों के शब्द 100 तक सीमित कर दिए गए.  सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का विशेष वकील पेश हुआ और कई सारी जानकारियों को निजी जानकारी बता कर उसे लोगों से दूर रखा गया.  राज्य सरकारों ने आरटीआई की कलाई मुड़ने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने तो इस मामले में सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिए.  सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद रिजर्व बैंक घोटालेबाज लोन धारकों की जानकारी लोगों तक नहीं पहुंचा रहा.

गौर करने वाली बात यह है कि जिन घोटालों के आधार पर मनमोहन सिंह सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था अब उन घोटालों की फाइलें तक लोगों को मुहैया नहीं करवाई जा रही है.   मोदी सरकार के लिए यह बेहद शर्मनाक है.

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