Sunday, March 31, 2019

Weekly media update week 13

Hi,

This week i have made few political videos. I am sure you will love it.

 • बीजेपी को कहां से मिलेगी ज्यादा सीटें? नुकसान भरपाई का यह है चाणक्य प्लान.

https://youtu.be/oxfQJtG_Slw

 • मुंबई में किन के वोटो के सहारे टिकी हुई है बीजेपी? मुंबई में चुनाव जीतने का चक्रव्यूह.

https://youtu.be/a0L6FDO0e-Q

 • On YouTube i have uploaded travel, music videos of Kashmir  Here are the links.

 • गुलमर्ग की टेबल लैंड और  स्ट्रॉबेरी फार्म

https://youtu.be/WQqoA4Ks-5Q

 • दमा दम मस्त कलंदर, म्यूजिक कंसर्ट.

https://youtu.be/roJ-DDqqsFE

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Regards,
Mayur Parikh

Friday, March 22, 2019

मुंबई की राजनीति मे गुजराती वोटों की हैसियत

ईशान्य मुंबई के घाटकोपर इलाके के कांग्रेसी नेता प्रवीण छेड़ा ने बीजेपी का दामन थाम लिया। यह कोई खबर नहीं लगती है। लेकिन प्रवीण छेड़ा का बीजेपी मे प्रवेश मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की हाजिरी में हुआ। यह नोट करने वाली बात है। इसके मायने कांग्रेस के लिए कहीं अधिक है। प्रवीण छेड़ा की विदाई के साथ ही कांग्रेस पार्टी के पास अब मुंबई शहर में एक भी गुजराती चेहरा नहीं बचा है।

कांग्रेस पार्टी ने मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान बिहारी बाबू संजय निरुपम के हाथों में सौंपी, संजय निरुपम ने भरपूर कोशिश करके बीजेपी के कॉरपोरेटर लेवल के वरिष्ठ कार्यकर्ता और नेताओं को कांग्रेस में लाने की शुरुआत की। कुछ एक हद तक उनकी राजनीति सफल होती हुई दिखाई दी। लेकिन चुनाव आते-आते कांग्रेस पार्टी अपने इन आयाती गुजरातियों को नहीं संभाल पाई। एक जमाना था जब मुंबई शहर में गुजराती कम्युनिटी कांग्रेस पार्टी को वोट करती थी। पी. यू. मेहता जैसे विधायक को हराना मुश्किल था। रजनी पटेल जैसे थोर कांग्रेसियों की वजह से मुंबई कांग्रेस की तूती दिल्ली तक बोलती थी। यह वह दौर था जब कांग्रेस पार्टी में कई सारे गुजराती कॉरपोरेटर थे। लेकिन कांग्रेस पार्टी इन कॉरपोरेटरो को विधायक नहीं बना पाई।

मुंबई की राजनीति में गुजरातियों का बड़ा अहम रोल है। यह कम्युनिटी राजनीति में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करती लेकिन वोटों की संख्या के लिहाज से इनकी अवगणना करने का मतलब है मुंबई में हार का मुंह देखना। मुंबई शहर में करीब 18 फीसद वोट गुजरातियों के हैं। लेकिन खास बात यह है कि तमाम गुजराती मुंबई के निश्चित इलाकों में बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं। बोरीवली, कांदिवली, मलाड, विले पार्ले, दहिसर, मालाबार हिल, मुलुंड, घाटकोपर, विक्रोली और अन्य छोटे-मोटे पॉकेट्स में गुजराती बड़ी संख्या में रहते हैं। यही वजह है की लोकसभा की उत्तर मुंबई और ईशान्य मुंबई की सीट गुजराती तय करते हैं।

इसी जगह पर बीजेपी का मामला फिट है जबकि शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी मात खा रही है। जनप्रतिनिधियों के रूप में  बात करें तो पूरे महाराष्ट्र में सिर्फ दो गुजराती विधायक हैं। यह दोनों गुजराती विधायक भारतीय जनता पार्टी के हैं। महाराष्ट्र से सांसद पद की बात करें तो सिर्फ दो सांसद गुजराती है। ईशान ने मुंबई से किरीट सोमैया बीजेपी से सांसद हैं जबकि विदर्भ की गोंदिया सीट से प्रफुल पटेल एनसीपी के सांसद हैं। प्रफुल पटेल का गुजरातियों के बीच कोई खास रसूख नहीं है। वह मराठी ओं के वोटों पर जीते हैं। जबकि किरीट सोमैया के वोटों में गुजरातियों का योगदान बहुत ज्यादा है।  मुंबई महानगर पालिका में 25 जितने कॉरपोरेटर गुजराती हैं जिनमें से 20 जितने कॉरपोरेटर भारतीय जनता पार्टी के हैं। मतलब साफ है कि गुजरातियों की वोट बैंक सीधे-सीधे भारतीय जनता पार्टी के पाले में जाती है। यही वजह है मुंबई में एक भी बड़ा मराठी चेहरा ना होने के बावजूद बीजेपी वोटों के मामले में अन्य पार्टियों को टक्कर दे देती है। दक्षिण मुंबई, उत्तर मुंबई और ईशान्य मुंबई यह तीनों सीटें बीजेपी के लिए कंफर्टेबल है।

Sunday, March 17, 2019

Weekly media updates - week 12 of year 2019

Hi,

Everybody is an election mode isn't it? In this hectic schedule last week I have written a blog on election agenda 2019 and few tourism videos.

 • On YouTube i have uploaded travel, music videos of Kashmir and beautiful visuals of recently ended kumbh mela 2019. Here are the links.

 • प्रयागराज में हुए कुंभ मेले की तस्वीर।

https://youtu.be/NXmMwkJSdHA

 • कश्मीर में केसर की खेती, नकली केसर कैसे पहचाने।

https://youtu.be/9r8dEA3-n5U

 • कश्मीरी संगीत। These are kashmiri folk music video by my team.

https://youtu.be/oHACugMPVqg

https://youtu.be/3YAlKRkeEL8

https://youtu.be/oHACugMPVqg

 • चुनाव का एजेंडा सेट करने में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही नाकाम।

http://www.mayurparikh.com/2019/03/blog-post.html?m=1

( this is my blog in Hindi language)

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Saturday, March 16, 2019

चुनाव का एजेंडा सेट करने में बीजेपी और कांग्रेस दोनों दल नाकाम।

चुनाव में कौन आगे रहेगा और किसे कितनी सीट मिलेगी इसका बहुत बड़ा आधार चुनाव किस एजेंडे के तहत लड़ा जा रहा है उसपर होता है। आम आदमी इसे चुनावी मुद्दा भी कहते हैं। लेकिन चुनावी मुद्दा यह चुनाव के एजेंड़ा से अलग होता है, वह चुनाव के एजेंडा से निकला हुआ एक बिंदु मात्र है। 

कोई भी बड़ा राजनीतिक दल जो किसी देश की अगुवाई करना चाहता हो उसे सफलता एक ही झटके में नहीं मिलती। बल्कि उस दल को अपनी भूमिका रखने में और चुनाव से पहले एक भूभाग में या एक समुदाय के बीच एजेंडा सेट करने में कई साल निकल जाते हैं, कई बार तो दशक भी निकल जाते हैं। इसे चुनाव का विज्ञान कहते हैं। महज एक ही दिन में खड़ी हुई पार्टी या दल या फिर कुछ लोगों का समुह कोई बहुत बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकता। यदि उसे सफलता मिल भी जाए तब भी वह क्षणिक और छोटी होती है।

ऐसा जरूरी नहीं है कि हमेशा ही राजनीतिक दल चुनाव का एजेंडा सेट करें। बल्कि कई बार सरकार की नीतियों से परेशान आम जनता भी चुनाव का एजेंडा खुद तय करती है। कुछ ऐसा समझ लीजिए की जनता जिन मुद्दों को सबसे ज्यादा अहमियत देती है उसे एजेंडा के रूप में मानकर वोटिंग करती है। जैसा कि हमने दिल्ली के चुनाव में देखा जहां कई सालों तक सत्ता पर काबीज कांग्रेस पार्टी को जनता ने नकार दिया और आम आदमी पार्टी की सरकार बनी। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष यानी मौजूदा भारतीय जनता पार्टी ने भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया संसद से लेकर कोर्ट और सड़क तक अपने मुद्दे को पहुंचाया और आखिरकार जनता ने इस एजेंडा का स्विकार करते हुए भारतीय जनता पार्टी को बहुमत दिया।

मौजूदा समय में अभी भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि भारत की जनता किस मुद्दे को एजेंडा के रूप में व्यापक स्वीकृति दे रही है।  पूरा का पूरा देश किस मामले पर वोट करेगा यह अभी अस्पष्ट है। बल्कि हम यह कह सकते हैं कि इस समय राष्ट्रीय स्तर पर किसी एक मुद्दे की स्वीकृति आम जनता के बीच पूर्ण रूप से नहीं मिल पाई है। यदि किसी एक मुद्दे को लेकर जनता एकत्रित हुए हैं तो वह राष्ट्रीय सुरक्षा है। 

गौर से देखा जाए तो चुनाव का एजेंडा कांग्रेस पार्टी बीजेपी से ज्यादा बेहतर ढंग से सेट कर रही थी। देश की प्रशासनिक व्यवस्था में उथल-पुथल का पूरा लाभ कांग्रेस पार्टी ने लिया। स्टेटिस्टिक्स डिपार्टमेंट के आंकड़े कांग्रेस के समर्थन में आए। नतीजा यह रहा की बेरोज़गारी, प्रशासनिक व्यवस्था में गड़बड़ी और जातीय हिंसा इस मसले को दिसंबर 2018 तक खूब उछाल मिला। राफेल विमान के घोटाले का मुद्दा उठाकर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भ्रष्टाचार में लिप्त बताया गया। ठीक उसी वक्त एक महागठबंधन की बात भी छिड़ी, ऐसा लग रहा था कि पूरा का पूरा विपक्ष एक मंच पर आने के बाद अब मोदी के खिलाफ कड़ी चुनौती मौजूद है। लेकिन जनवरी 2019 के बाद इन तमाम मसलों की हवा निकल गई।

महागठबंधन बन नहीं पाया और फिर एक बार राष्ट्रीयता के मुद्दे पर पूरा देश एक साथ खड़ा दिखाई देने लगा। रफेल के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक बहुत बड़ा जनाधार जो कांग्रेस के साथ खड़ा दिखाई दे रहा था, वह तितर-बितर हो गया, महागठबंधन में फूट पड़ने की वजह से मोदी विरोधी वोट अब पूरी तरह से बट चुके हैं, प्रशासनिक व्यवस्था में गड़बड़ी अब पुराना मुद्दा है, जातीय वाद यह मसला सिर्फ उन्हीं लोगों तक सीमित रह गया है जो इस मुद्दे से अपना लाभ लेना चाहते हैं या फिर इस मुद्दे की वजह से जो पीड़ित हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस की रणनीति दिसंबर 2018 तक तो पूरी तरह से ठीक रही और एजेंडा सेट करने के मामले में वह सबसे आगे निकल गई लेकिन भारत और पाकिस्तान के मसले के बाद लोगों का ध्यान राष्ट्रीय मुद्दे पर चला गया। अब एक बार फिर कांग्रेस पार्टी वहीं मुद्दों को लेकर आगे बढ़ना चाहती है जिसे 3 महीने का ब्रेक मिल चुका है।
वहीं दूसरी और भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रवाद की बात को लेकर लोगों को एक सूत्र में बांधने की कोशिश कर रही है।  भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सहयोगी पार्टियों के साथ मनमुटाव मिटा दिया और फिर एक बार एनडीए का गठन हो गया। 

मोटे तौर पर ऐसा लग रहा है कि इस चुनाव में लोगों की राय बटी हुई है, दोनों ही प्रमुख दल चुनाव का एजेंडा सेट करने में नाकामयाब रहे हैं। ऐसे में चुनाव के लिए जो मुद्दे हैं वह व्यक्तिगत रूप से मूल्यांकन होने के बाद वोटिंग में तब्दील होगा।

मतलब साफ है कि भारत देश में इस चुनाव का एजेंडा सेट करने में तमाम राजनीतिक दल विफल हुए हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बिखरे हुए मुद्दों के साथ क्या जनाधार भी बिखरा हुआ होगा?

Sunday, March 10, 2019

चुनाव का ऐलान

  चुनाव का ऐलान

 • 23 मई को आएगा फैसला
 • 7 फेज में होगा चुनाव
 • 11 अप्रैल को पहली वोटिंग
 • 18 अप्रैल
 • 23 अप्रैल
 •  29 अप्रैल
 • 6 मई
 • 12 मई
 • 19 मई

 • पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार में सातो चरण में मतदान होगा।

 • महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओड़िशा में चार चरणों में चुनाव होंगे

 • दिल्ली, गुजरात, पुदुचेरी, चंडीगढ़, लक्ष्यदीप, पंजाब, गोवा, हरियाणा, नागालैंड, अंडमान, तेलंगाना,  केरल, मेघालय, मिजोरम में एक ही दिन में होगी वोटिंग

 • असम और छत्तीसगढ़ में दो चरणों में चुनाव होंगे

 • जम्मू कश्मीर में पांच चरणों में मतदान होगा

 • आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, सिक्किम, जम्मू कश्मीर,  राज्य सरकार के भी चुनाव होंगे।