Sunday, October 26, 2014

अफजल खान की फौज और छत्रपती शिवाजी महाराज का कॉपीराईट.

अफजल खान की फौज और छत्रपती शिवाजी महाराज का कॉपीराईट.

महाराष्ट्र के चुनाव खत्म होने के बाद अब न तो यहां किसीको अफजल खान बताया जा रहा है और नही गलीओ मे छत्रपती शिवाजी महाराज के नारे लग रहे है. वॉट्स अप पर अब गुजरात के खिलाफ कोई मैसेज भी नहीं आ रहा है. सब कुछ शांत है क्योंकि चुनाव के नतीजे आ चुके है.

नतीजो से कईओ को अश्चर्य हुआ है. इसकी वजह है प्रचार के दौरान बीजेपी ने जिस सटीक ढंग से अपने नेताओ का इस्तमाल किया वह अन्य दल नहीं कर पाए. इतना ही नहीं बीजेपी के प्रचार के प्रभाव को भांपने मे अन्य तमाम दल सरेआम नाकामयाब रहे.

मिसाल के तौर पर हम उत्तर मुंबई की दहीसर सीट को देख सकते है. मुंबई के दहीसर इलाके मे शिवसेना का दबदबा माना जाता है. यहां के विधायक थे शिवसेना के विनोद घोसाळकर. विनोद घोसाळकर पूरे उत्तर मुंबई की शिवसेना की तमाम जिम्मेदारी संभालते है. मातोश्री मे उनका दबदबा भी है. उनका चुनाव हारना और उस सीट से पहली बार विधायकी का चुनाव लड रही बीजेपी की मनीषा चौधरी का चुनाव जीतना कईओ को समझ नहीं आया. लेकिन बीजेपी का इस सीट पर जिस स्ट्रेटर्जी के तहत काम चल रहा था वह योजना कारगार साबीत हुई. पुरे महाराष्ट्र मे किसी सीट पर यदि सबसे ज्यादा गुजराती वोटर है तो वह इसी सीट पर है - करीब 37 फीसदी. वोटर पेटर्न का अभ्यास करने के बाद बीजेपी ने यहां स्टार कैम्पेनर बनाया गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को. आनंदीबेन पटेल यहां 4 से ज्यादा बार प्रचार के लिए आइ और स्थानिय कोलेज के पासआउट विद्यार्थीओ के कार्यक्रम मे दो बार शरीख हुई. शाम के समय वे गार्डन मे सिनीयर सिटीजन के साथ इवनिंग वॉक करती हुई नजर आई. लेकिन इन तमाम गतीविधीओ को मिडीया से एकदम दुर रखा गया. इसके अलावा गुजरात के मंत्री रमणभाई वोरा, विधायक रामजी पटेल, अहमदाबाद बीजेपी के अध्यक्ष, अहमदाबाद म्युनिसीपल कोर्पोरेशन के 3 पार्षद, बनासकांठा के सांसद हरीभाई चौधरी समेत करीब 30 35 बीजेपी के पदाधीकारी चुनाव के 10 दिन पहले कमर कस चुके थे.
दहीसर इलाके मे शिवसेना का ग्राउंड वर्क मजबुत है और कार्यकर्ताओ की कोई कमी नहीं. जबकी इससीट पर बीजेपी की स्थीती कमझोर है ( अभीभी कमझोर ही है). इस स्थीती को भांपते हुए बीजेपी ने बहार से नेताओ का जमावडा लगा दिया. लेकिन इसका इल्म किसीको नहीं हुआ और नाही अखबार या टीवी पर यह ग्राउन्ड रियालिटी दर्ज हो पाई. दहीसर सीट पर यह बहार से आए नेता एक एक बील्डींग मे जा रहे थे और मतदाताओ से मिलकर व्यक्तिगत रुप से नरेन्द्र मोदी के विचारो को समझा रहे थे. ठीक उसी समय शिवसेना के इस सिट के विधायक विनोद घोसाळकर सडक पर प्रचार कर रहे थे और यह सीट उन्हे सेफ सीट लग रही थी.

इसी सीट की बगल मे कांदीवली पूर्व की सीट है. जहां कोंग्रेस के विधायक रमेश सिंग ठाकुर आसानी से चुनाव जीतेंगे एसी हवा चल रही थी. लेकिन मामला जमिनी स्तर पर बदल रहा था. दहीसर की तरह ही यहां छोटे छोटे पॉकेट मे बडे बडे नेता गुपचुप तरीके से मिडीया से अपने आपको बचते बचाते प्रचार कर रहे थे. मसलन कांदीवली पूर्व की सीट पर बंगालीओ की एक बस्ती है. इस बस्ती मे दशहरा के दिन बंगाल के बीजेपी के इकलौते विधायक बाबुल सुप्रीयो दुर्गा माता की आरती उतारने पहुंच गए. जाहिर सी बात है कि इतना बडा गायक यदि किसी मंडल मे अपनी आवाज मे आरती गाए तो क्या होगा. वो आ गए और बंगालीओ के बीच छा गए. बस, होना क्या था, पुरी बस्ती के वोट बीजेपी को मिले. इस विधानसभा सीट पर कुल 160 सोसायटीओ की सूची बीजेपी ने बनाई थी. इन सोसायटीओ मे कौन रहता है, वह किस राज्य का है इन तमाम बातो का ध्यान रखते हुए एक एक बस्ती मे देश के अलग अलग इलाके से बीजेपी के बडे नेता आए और लोगो को मोदी फॉर्मूला समझा दिया. नतीजा बीजेपी के पक्ष मे रहा. बीजेपी का उम्मीदवार चुनाव जीत गया.

यहीं रणनिती बीजेपी की पूरे मुंबई मे रही. बीजेपी का प्रचार एक एक गली मे अलग अलग नेता कर रहे थे. शायद इसीलिए उद्धव ठाकरे ने प्रचार के इस गल्ली हमले को अफजल खान की फौज करार दे दिया.

वहीं दुसरीओर शिवसेना के पास अपना इकलौता स्टार प्रचारक है उद्धव ठाकरे. एक ही दिन होने वाले मतदान मे समय की कमी और हर एक गल्ली मे हो रहे प्रभावी प्रचार का जवाब वो वाट्सअप के माध्यम से दे रहे थे. उनके पास स्वयंघोषीत कॉपीराईट है छत्रपती शिवाजी महाराज का. चुनाव मे उन्होने छत्रपती के नाम पर वोट मांगे और बीजेपी के नेताओ की फौज को अफजल खान की फौज करार दे दिया. लेकिन यह पुरी यंत्रणा और स्टेटर्जी गलत रही. गुजरातीओ के खिलाफ प्रचार का नतीजा यह रहा की तमाम गैर मराठी वोट एकजुट हुए. लेकिन मराठी वोट अन्त तक बटे रहे. छत्रपती शिवाजी महाराज का कॉपीराईट सिर्फ शिवसेना के पास ही है यह बात तमाम मराठी मानने तो तैयार नहीं थे. शिवसेना पर पुरे चुनाव मे एक भी आरोप न लगाने वाली बीजेपी को मराठीओ के सोफ्ट कोर्नर का भी लाभ मिला. नतीजतन इस पुरे वोटो के गणीत मे बीजेपी एक अंक आगे रही. मुंबई की 15 सीट बीजेपी जीत गई.

यह आगाझ है ढाई साल बाद होने वाले बीएमसी चुनाव का. बीजेपी ने मुंबई मे शिवसेना से ज्यादा सीटे जीती है. अब यह तमाम जीते हुए विधायक काम पर लग जाएंगे और बीएमसी मे सत्ता की भागीदारी का आनंद ले रही बीजेपी अपने दम पर परचम लहराने की कोशीष करेंगी.

बहरहाल, मुंबई की गलीओ मे शांती है. नातो यहां अफजल खान की फौज है और नाही छत्रपती शिवाजी महाराज की कॉपीराईट की लडाई.




1 comment:

shirish kashikar said...

Fantastic ground analysis mayur...kudos..this is what i have been pushing during my tv debates on maharashtra election analysis.bjp won the game by focusing on their own strategy instead of attacking its rivals & it paid handsomely.