Friday, December 12, 2014

નરેન્દ્ર ભાઈ વિશે થોડું ..

નરેન્દ્ર ભાઈ વિશે થોડું ..

કોઈ માણસ સફળ થાય ત્યારે આપણે નસીબ નામ ની અદ્રશ્ય વસ્તુ ને તેની ક્રેડીટ આપતા હોઈએ છીએ પણ તેનું સમર્પણ અને હાડવર્કિંગ આપને નથી દેખાતું ..

-     તેમનો સુવાનો સમય ગમે તે હોય ઉઠવા નો સમય ફિક્સ છે સવારે 4.45 વાગે ,

-     રોજ સવારે ૩૦ મિનીટ માં તેમના દૈનિકકાર્ય પૂર્ણ કરી ( ટોઇલેટ માં મુખ્ય પેપર વાંચી લે છે ) ૩૦ મિનીટ કસરત કરે છે અને તે સમયે આગાઉ ના દિવસે દુનિયા ભર ની ન્યુઝ ચેનલ માં ભારત અને ભાજપ ને લાગુ પડતા સમાચાર નું રેકોડીંગ સાંભળી લે છે .

-     10 મિનીટ મંદિર સામે બેસી ધ્યાનધરે છે .  

-     એક કપ ચાય સાથે કોઈ જ નાસ્તો લેતા નથી .

-     ૬ .૧૫ ની આસપાસ એક સરકારી વિભાગ તેમનાં ઘર માં મીટીંગ રૂમ માં પ્રેજન્ટેશન માટે તૈયાર જ હોય છે                          

-     ૭ થી ૯ તેમના ઘરે આવેલ મહત્વ ની ફાઈલો ચેક કરે છે . તથા તેમના માતૃ શ્રી ને ફોન કરી ખબર અંતર પૂછે છે ( ભારત ના વડાપ્રધાન ને માં માટે સમય છે આપને ?)

-     ૯ વાગે ગાજર અથવા અન્ય સલાડ નો નાસ્તો કરે છે તથા પંચામૃત પીણું પીવે છે ( રેસીપી – 20 ml મધ , 10 ml દેશી ગાય નું ઘી ,તથા ફુદીના , તુલસી અને લીમડા ના મોર નું મિક્સ જ્યુસ અને એક લીંબુ )

-     ૯.૧૫ કાર્યાલય પર પહોંચી મહત્વ ની મીટીંગો પતાવે છે .

-     બપોરે જમવા માં ૫ જ વસ્તુ લે છે ( ગુજરાતી રોટલી , શાક , દાળ ,સલાડ , છાશ )

-     સાંજ ના ૪ વાગે દુધ વગર ની લેમન ટી

-     સાંજે ૬ વાગે ખીચડી અને દૂધ નું ભોજન

-     રાત્રે ૯ વાગે દેશી ગાય નું દૂધ એક ગ્લાસ સુંઠ નાખી ,

-     મુખવાસ માં કાયમ લીંબુ મારી નાખેલો શેકેલો અજમો , ( તેના થી વાયુ ના થાય )

-     ૯ થી ૯.૩૦ ચાલે છે સાથે એક વિષય ના જાણકાર ને રાખી તેની સાથે ચર્ચા કરે છે .

-     ૯.૩૦ થી ૧૦ સોશ્યલ મીડિયા તથા સિલેક્ટેડ પત્રો ના જવાબ આપે છે .

નરેન્દ્ર ભાઈ એ જિંદગી માં ક્યારેય

-     સોફ્ટ ડ્રીંક પીધું નથી કે ફાસ્ટ ફૂડ ખાધું નથી

-     ભારત ના ૪૦૦ જીલ્લા નો તેમણે પ્રવાસ કરેલો છે .

-     તેઓ ગુજરાત થી દિલ્લી ગયા ત્યારે માત્ર બેજ વસ્તુ સાથે લઇ ગયા એક કબાટ કપડા અને ૬ કબાટ પુસ્તકો

-     તેઓ આટલા સતત પ્રવાસ દરમ્યાન રાત્રી વસો કાયમ કોઈ સંત સાથે આશ્રમ માં કે કોઈ નાના કાર્યકર ને ઘેર રોકાતા હોટલ માં ક્યારેય નહિ , વડનગર ની લાઈબ્રેયી ના તમામ પુસ્તકો તેમણે વાંચી નાખ્યા હતાં

-     તેઓ કોઈ પણ પ્રસંગે અંગત ભેટ આપે તો તે પુસ્તક જ હોય છેલ્લા એક દાયકા થી ગુજરાત માં નવ વિવાહીતો ને સીહ્પુરુષ પુસ્તક ભેટ માં આપતા આજે ભારત ના વડાપ્રધાન તરીકે સહુ ને તેઓ ભગવદ ગીતા ભેટ આપે છે .

-     તેઓ ટુથ બ્રસ નહિ પણ કરંજ નું દાતણ કરે છે .

-     તેમના રસોડા માં મીઠાં ને બદલે સિંધાલુણ વપરાય છે .

-     પ્રવાસ દરમ્યાન ફાઈલો તથા ચર્ચા કરાવવા વાળા મંત્રી અધિકારી સતત સાથે હોય છે .

-     64 વર્ષ ની ઉમરે સીડી ઉતરતા તેઓ ક્યારેય રેલીંગ નથી પકડતા ,

-     એક દિવસ ની 19 સભા ઓ તેમણે કરેલી છે .

-     આંખ કાયમ ત્રિફલા ના પાણી થી ધોવે છે ( હરડે બહેડે આમળા આખા રાત્રે પલાળી  સવારે તેનું પાણી )

-     ગુજરાત ના મુખ્ય મંત્રી હતાં ત્યારે એક વાર સ્વાઈન ફ્લુ સમયે અને એક વાર દાઢ ના દુખાવા સમયે જ ડોક્ટર ની તેમણે જરૂર પડી હતી .

-     વડાપ્રધાન બન્યા બાદ પણ ગુજરાત ભાજપ ના કાર્યકરો ને દુખ:દ પ્રસંગે સાંત્વના પાઠવવા જરૂર ફોન કરે છે . ( મોટા બન્યા બાદ ભૂલાય નહિ ભાઈ ..તે શીખો )

-     તેમના અંગત સ્ટાફ ના તમામ દીકરા દીકરી નું એજ્યકેશન સ્ટેટસ તેમને ખબર હોય છે . અને તેનું ફોલોપ રાખે છે ( સમાજ સેવા માં અંગત લોકો બાદ ના થઇ જાય તે શીખો )

Thursday, November 13, 2014

बीजेपी ने विश्वास का मत कैसे जीता - मेरी आंखो देखी.

तमाम अखबार मे बीजेपी ने जिस तरह से विश्वास का मत जिता उसपर टिप्पणीया छपी है. जब विश्वास का मत पारीत हो रहा था उस समय मै महाराष्ट्र विधानसभा की पत्रकार गैलरी मे मौजुद था. तमाम घटनाक्रम बडे नाटकीय अंदाज मे हुए.
इस घटनाक्रम की रुपरेखा एक दिन पहले ही बन चुकी थी जिसका सबुत है विधानसभा के सचीव द्वारा एक दिन पहले तमाम विधायको को भेजा गया एजंडा. 11 तारीख की रात यानी विश्वास मत प्रस्ताव के एक दिन पहले विधायको को जो एजंडा भेजा गया था उसमे विपक्ष के नेता के चयन या मुद्दा नहीं था. लेकिन देर रात करीब 10.30 बजे एक नया एजंडा बना जो एसएमएस के माध्यम से तमाम विधायको को भेजा गया. इस नए एजंडा के पहले क्रम पर था स्पीकर का चयन, दुसरे क्रम पर था विपक्ष के नेता का चयन और तीसरे क्रम पर था विश्वास मत प्रस्ताव. विधायको को पहले भेजे हुए एजंडा मे विपक्ष के नेता के चुनाव को कोइ उल्लेख नहीं था. यह बदलाव किसने करवाया और क्यों यह आज भी रहस्य है. इस मामले पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने जांच ओर्डर की है.
देखने मे छोटी लगने वाली यह 'विपक्ष के नेता' के चयन की बात इतनी टैकनिकल है कि कोताही बरतने पर विश्वास मत के दौरान बीजेपी को परेशानी झेलनी पड सकती थी. 10 तारीख को यदि नवनिर्वाचीत स्पीकर एजंडा के अनुसार विपक्ष के नेतापद का चयन विश्वास मत के प्रस्ताव से पहले करते तो उसके परिणाम बीजेपी को विश्वास मत के समय भुगतने पडते. मसलन, विपक्षी नेता की मांग पर वोटींग होता, विपक्षी नेता की मांग पर तमाम नेताओ के भाषण होते और यह तमाम चीज बीजेपी को अडचन मे ला सकती थी.
लेकिन एसा कुछ भी नहीं हुआ. हाउस शुरु होते ही पहले अध्यक्ष का चयन हुआ और फिर तमाम नेताओ ने अध्यक्ष को बधाई देते हुए भाषण किए. आभार प्रदर्शन समाप्त होने पर अध्यक्ष के एक भी मिनट न गंवाते हुए घोषणा कर दी कि पहले विश्वास मत पारीत होगा और फिर विपक्षी नेता चुना जाएगा. स्पीकर के इस फैसले पर कोंग्रेस और शिवसेना कुछ बोलना चाहते थे. लेकिन समय गंवाए बीना सत्ता मे बैठे बीजेपी के नेता आशीष शेलार ने विश्वास मत पेश कर दिया. शोरशराबे के बीच स्पीकर ने घोषीत कर दिया कि मतदान ध्वनी से होगा और पहली घोषणा हुई की जिन्हे सरकार के समर्थन मे मत देना हो वह हां कहे. यह बात सुनते ही बीजेपी के तमाम विधायक खडे हुए और हां..... हां..... चिल्लाने लगे. इस समय एनसीपी के तमाम विधायक चुप बैठे रहे. किसी ने हां नहीं कहा. जब यह शोर शराबा चल रहा था तब कोंग्रेस और शिवसेना के विधायक अपनी विपक्ष के नेतापद के चयन की मांग को लेकर स्पीकर के पास जा रहे थे. हां.... की आवाज खत्म होने पर स्पीकर ने कहा -  विरोध मे... और इसके जवाब मे किसी ने ( कोंग्रेस और शिवसेना ने भी ) नां.... नहीं कहा. एक क्षण मे फैसला सुनाते हुए स्पीकर ने कहा कि हां की आवाज मुझे सुनाई दी और विश्वास मत पारीत हुआ.
जैसे ही अध्यक्ष ने विश्वास का मत पारीत कर दिया कोंग्रेस और शिवसेना के विधायक ने वोटींग की मांग की, लेकिन एजंडा आगे जा चुका था और अब वोटींग का सवाल ही नहीं था. मसलन, बहुमती साबीत हो गई. यह बात समज मे आते ही कोंग्रेस और शिवसेना ने भारी हंगामा खडा कर दिया. स्पीकर ने हाउस को एडजोर्न कर दिया. मामला खत्म....
यह पुरा वाकया 5 मिनट के भीतर खत्म हुआ. लेकिन टैक्नीकल बारीकी देखे तो बीजेपी ने काम चालाकी से कर लिया है. विपक्ष का नेता पहले नहीं चुनकर शिवसेना को संवैधानिक अधिकार से अलग रखा. वहीं एनसीपी ने 'हां' भी नहीं कहा और 'ना' भी नहीं कहा. यानी टथस्त रहते हुए उसने सरकार बनवा दी. वहीं विपक्ष के नेता के चयन की मांग मे मसरुफ शिवसेना और कोंग्रेस को इस बात का खयाल ही नहीं रहा की राजनैतिक दांवपेच उनके हाथ से खिसक रहा है. सही समय पर वोटींग न मांगने से एनसीपी की भूमिका गुलदस्ते मे रही. वहीं बीजेपी के एनसीपी के साथ क्या संबंध है उसको लेकर ओन रिकार्ड कुछ न आ सका.

उफ... कितनी बडी राजनैतिक गलती. खैर, सरकार बन चुकी है. अब 6 महिने से पहले अविश्वास का प्रस्ताव पेश नहीं हो सकता. तब तक फडनवीस सरकार कैसा काम करती है यह देखना दिलचस्प होगा. खासतौर पर 8 दिसंबर से शुरु हो रहा नागपुर अधिवेशन बीजेपी की अल्पमत सरकार कैसे सफलतापुर्वक काटती है और प्रस्ताव कैसे पारीत करवाती है यह आने वाला समय ही बताएगा.  

Wednesday, November 12, 2014

बीजेपी के समर्थन से एनसीपी को क्या लाभ मिलेगा.

सरकार बनाने मे अहम भूमिका रही एनसीपी की. लेकिन पावर पोलिटीक्स मे माहिर पवार को यह कदम उठाने से क्या लाभ हुआ. आने वाले समय मे कौन से कौन से मुद्दो पर बीजेपी को एनसीपी के बारेमे नर्म रुख अख्त्यार करना पडेगा यह देखना दिलचस्प होगा. 

राजनिती मे कई कदम बेहद शातीर तरीके से लिए जाते है. महाराष्ट्र मे बीजेपी की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने सहकार मंत्री चंद्रकांत पाटील के साथ मिलकर एक एसा ही फैसला लिया. तारीख थी ६ नवंबर, देर शाम मंत्रालय मे हुई बैठक मे महाराष्ट्र की 302 बाझार समिती यानी एपीएमसी मे से 100 एपीएमसी कमिटीओ को एक्सटेन्शन देने से मना कर दिया गया. यह वो एपीएमसी है जिनकी मियाद ५ साल की होती है और सरकार यदि चाहे तो उसे एक्सटेन्शन दे सकता है. अक्तूबर मे पुरे होने वाले इन तमाम एपीएमसी कमिटीओ को सरकार चाहे तो फिर एक बार काम करने की इजाजत दे सकती है. लेकिन यह नहीं हुआ. अब यहां चुनाव होने की लंभावना है. इतना ही नहीं इन एपीएमसी मे एडमिनीस्ट्रेटरो को नियुक्त कर दिया जा सकता है. जिन एपीएमसीओ को एक्सटेंशन नहीं दिया उनमे वाशी एपीएमसी मार्केट भी शामिल है जोकि राज्य की सबसे ज्यादा टर्नओवर करने वाली एपीएमसी भी है. इसके अलावा पूणे, अमरावती, दादरा नगर हवेली की एपीएमसी भी शामिल है. कहने की जरुरत नहीं कि इन एपीएमसीओ मे एनसीपी और कोंग्रेस का दबदबा है. खासतौर पर एनसीपी. सबको पता  है कि एनसीपी की राजनिती की रीढ की हड्डी है सहकार क्षेत्र की इकाईयां. यहीं उनके कार्यकर्ता और नेता काम करते है यहीं से लोगो को संपर्क मे आते है और यहीं से उनकी गांव की राजनिती शुरु होती है. सरकार के इस एक फैसले से सहकार क्षेत्र मे हडकंप मच गया. क्या यहीं से बीजेपी की राजनिती शुरु हुई.  

अब इन एपीएमसी मे ६ महिनो के बाद चुनाव होंगे. इन चुनावो मे सरकार की भूमिका अहम होगी. एनसीपी यदि सरकार से दो दो हाथ कर ले तो उसे महंगा पड सकता है. वहीं सींचाई घोटाले की फाईले सरकार के पास मौजु है. एनसीपी के कई वरिष्ठ नेताओ के नाम इन फाईलो मे नामजत है. सरकार चाहे तो इनपर इन्कवाईरी शुरु कर सकती है जिसका नतीजा एनसीपी के लिए भयानक हो सकता है. इसके अलावा एनसीपी के नेताओ के खिलाफ बीजेपी के नेता किरीट सोमैया ने कोर्ट मे कई केस कर रखे है. आय से अधिक संपत्ती से लेकर सरकारी काम मे कोताही के आरोप है. इन तमाम केसीस की कमान बीजेपी के याचीका कर्ताओ के पास है. एसेमे एनसीपी ने जो रुख हाउस मे लिया है वह रुख आने वाले दिनो मे उन्हे क्या क्या लाभ पहुंचाता है वह देखना दिलचस्प होगा. क्या यहीं तमाम मामले पवार साहब की पावर डील है. सवाल का जवाब आनेवाले दिनो मे मिलेगा.





Monday, November 10, 2014

शिवसेना अपने सबसे कमजोर दौर मे.

शिवसेना को चुनाव मे भले ही दूसरे क्रम की सबसे ज्यादा सीट मिली हो, लेकिन निर्णय लेते समय जो ढीलाई हो रही है उससे पक्ष और पक्ष अध्यक्ष उद्धव ठाकरे की इमेज को ठेस पहुंच रही है. खास तौर पर शिवसैनिको को यह ढीला-ढाला रवैया बिलकुल पसंद नहीं है. उद्धव ठाकरे ने अनिल देसाई को मंत्री बनाने का फैसला किया. लेकिन आनंदराव अडसूळ और चंद्रकांत खैरे जैसे वरिष्ठ नेताओं ने स्पष्ट विरोध जता दिया. कई पत्रकारों को फोन के माध्यम से उन्होने अपनी नाराज़गी बताई. नतीजा यह रहा ही उद्धव ठाकरे को एन वक्त पर अनिल देसाई को दिल्ही से मुंबई वापस बुलाना पडा. मंत्री मंडल मे शिवसेना का एक भी मंत्री नहीं जा पाया. सूत्र की माने तो सुरेश प्रभु को बीजेपी के कोटे से मंत्री बनाने की शिवसेना ने मांग की थी जोकि बीजेपी ने मान ली ( क्योंकि बीजेपी के कोटे से मंत्री बनने पर राज्य सभा मे सांसद बनाने की जिम्मेदारी भी बीजेपी की ही होगी). लेकिन राजनीति के यह तमाम खेल शिवसैनिको को नहीं पता है. नतीजा यह हुआ की अनिल देसाई के मुंबई एयरपोर्ट पहुंचने पर तमाशा हुआ और पूरे तमाशे को एन्टी बीजेपी के रुप मे देखा गया.
आनन फानन मे शिवसेना की जो बैठक हुई उसमे जो रवैया उद्धव ठाकरे ने अपनाया उससे शिवसैनिकों मे नाराज़गी और भी बढ़ी है. आम कार्यकर्ता यह समझ रहा था कि बीजेपी के साथ गठबंधन की संभावना समाप्त होगी और शिवसेना का कोई विधायक विपक्ष नेता पद पर आसीन होगा. लेकिन एक बार फिर एसा नहीं हुआ. शिवसेना ने जो शर्तें बीजेपी के सामने रखी है वह हास्यास्पद है. शिवसेना बीजेपी के बीच की बातचीत एक चूहे बिल्ली के खेल की तरह बन चुका है. बीजेपी का बर्ताव एसा है मानो उन्हे समर्थन की दरकार नहीं है. वहीं शिवसेना का बर्ताव एसा लग रहा है कि वो समर्थन देना तो चाहती है लेकिन अपनी शर्तों पर.
मौजूदा वातावरण मे शिवसेना अपने सबसे कमजोर दौर मे दिख रही है.  

Wednesday, October 29, 2014

महाराष्ट्र चे मुख्यमंत्री - 1960 ते आज पर्यंत

विधानसभेचा क्रमांक
विधानसभेचा कालावधी

मुख्यमंत्री
कार्यकाल
पासून           
पर्यंत
पहिली
1 मे 1960  
3 मार्च 1962
1. यशवंतराव चव्हाण
1 मे 1960 ते 3 मार्च 1962
दुसरी
3 मार्च 1962
1 मार्च 1967
यशवंतराव चव्हाण
3 मार्च 1962 ते 20 नोव्हेंबर 1962



2. मारोतराव कन्नमवार
21 नोव्हेंबर 1962 ते 24 नोव्हेंबर 1963



3. वसंतराव नाईक
5 डिसेंबर 1963 ते 1 मार्च 1967
तिसरी
1 मार्च 1967
13 मार्च 1972
वसंतराव नाईक
1 मार्च 1967 ते 1 मार्च 1972
चौथी
13 मार्च 1972
2 मार्च 1978
वसंतराव नाईक
13 मार्च 1972 ते 20 फेब्रुवारी 1975



4. शंकरराव चव्हाण
21 फेब्रुवारी 1975 ते 16 एप्रिल 1977



5. वसंतराव पाटील
17 एप्रिल 1977 ते 2 मार्च 1978
पाचवी
2 मार्च 1978
 17 फेब्रुवारी1980
वसंतराव पाटील
7 मार्च 1978 ते 17 जुलै 1978



6. शरद पवार
18 जुलै 1978 ते 17 फेब्रुवारी 1980


17 फेब्रुवारी  1980 ते 9 जून 1980 या काळात राष्ट्रपती राजवट

सहावी
9 जून 1980
8 मार्च 1985
7. ए.आर. अंतुले
9 जून 1980 ते 12 जानेवारी 1982



8. बाबासाहेब भोसले
20 जानेवारी 1982 ते 1 फेब्रुवारी 1983



वसंतराव पाटील
2 फेब्रुवारी 1983 ते 8 मार्च 1985
सातवी
8 मार्च 1985
3 मार्च 1990
वसंतराव पाटील
10 मार्च 1985 ते 1 जून 1985



9. शिवाजीराव पाटील निलंगेकर
3 जून 1985 ते 7 मार्च 1986



शंकरराव चव्हाण
14 मार्च 1986 ते 24 जून 1988



शरद पवार
25 जून 1988 ते 3 मार्च 1990
आठवी
3 मार्च 1990
14 मार्च 1995
शरद पवार
4 मार्च 1990 ते 25 जून 1991



10. सुधाकरराव नाईक
25 जून 1991 ते 23 फेब्रुवारी 1993



शरद पवार
6 मार्च 1993 ते 13 मार्च 1995
नववी
14 मार्च 1995
15 जुलै 1999
11. मनोहर जोशी
14 मार्च 1995 ते 30 जानेवारी 1999



12. नारायण राणे
1 फेब्रुवारी 1999 ते 17 ऑक्टोबर 1999
दहावी
11 ऑक्टोबर 1999
2004
13. विलासराव देशमुख
18 ऑक्टोबर 1999 ते 18 जानेवारी 2003



14. सुशीलकुमार शिंदे
18 जानेवारी 2003 ते 30 ऑक्टोबर 2004
अकरावी
2004
2009
विलासराव देशमुख
1 नोव्हेंबर 2004 ते 5 डिसेंबर 2008



15. अशोक चव्हाण
8 डिसेंबर 2008 ते 10 ऑक्टोबर 2009
बारावी
2009
2014
अशोक चव्हाण
10 ऑक्टोबर 2009 ते 9 नोव्हेंबर 2010



16. पृथ्वीराज चव्हाण
10 नोव्हेंबर 2010 ते 26 सप्टेंबर 2014



26 सप्टेंबर 2014  ते 28 ऑक्टोबर 2014 या काळात राष्ट्रपती राजवट



तेरावी
2014
2019
17. देवेंद्र फडणवीस
31 ऑक्टोबर 2014 ते ----

Sunday, October 26, 2014

अफजल खान की फौज और छत्रपती शिवाजी महाराज का कॉपीराईट.

अफजल खान की फौज और छत्रपती शिवाजी महाराज का कॉपीराईट.

महाराष्ट्र के चुनाव खत्म होने के बाद अब न तो यहां किसीको अफजल खान बताया जा रहा है और नही गलीओ मे छत्रपती शिवाजी महाराज के नारे लग रहे है. वॉट्स अप पर अब गुजरात के खिलाफ कोई मैसेज भी नहीं आ रहा है. सब कुछ शांत है क्योंकि चुनाव के नतीजे आ चुके है.

नतीजो से कईओ को अश्चर्य हुआ है. इसकी वजह है प्रचार के दौरान बीजेपी ने जिस सटीक ढंग से अपने नेताओ का इस्तमाल किया वह अन्य दल नहीं कर पाए. इतना ही नहीं बीजेपी के प्रचार के प्रभाव को भांपने मे अन्य तमाम दल सरेआम नाकामयाब रहे.

मिसाल के तौर पर हम उत्तर मुंबई की दहीसर सीट को देख सकते है. मुंबई के दहीसर इलाके मे शिवसेना का दबदबा माना जाता है. यहां के विधायक थे शिवसेना के विनोद घोसाळकर. विनोद घोसाळकर पूरे उत्तर मुंबई की शिवसेना की तमाम जिम्मेदारी संभालते है. मातोश्री मे उनका दबदबा भी है. उनका चुनाव हारना और उस सीट से पहली बार विधायकी का चुनाव लड रही बीजेपी की मनीषा चौधरी का चुनाव जीतना कईओ को समझ नहीं आया. लेकिन बीजेपी का इस सीट पर जिस स्ट्रेटर्जी के तहत काम चल रहा था वह योजना कारगार साबीत हुई. पुरे महाराष्ट्र मे किसी सीट पर यदि सबसे ज्यादा गुजराती वोटर है तो वह इसी सीट पर है - करीब 37 फीसदी. वोटर पेटर्न का अभ्यास करने के बाद बीजेपी ने यहां स्टार कैम्पेनर बनाया गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को. आनंदीबेन पटेल यहां 4 से ज्यादा बार प्रचार के लिए आइ और स्थानिय कोलेज के पासआउट विद्यार्थीओ के कार्यक्रम मे दो बार शरीख हुई. शाम के समय वे गार्डन मे सिनीयर सिटीजन के साथ इवनिंग वॉक करती हुई नजर आई. लेकिन इन तमाम गतीविधीओ को मिडीया से एकदम दुर रखा गया. इसके अलावा गुजरात के मंत्री रमणभाई वोरा, विधायक रामजी पटेल, अहमदाबाद बीजेपी के अध्यक्ष, अहमदाबाद म्युनिसीपल कोर्पोरेशन के 3 पार्षद, बनासकांठा के सांसद हरीभाई चौधरी समेत करीब 30 35 बीजेपी के पदाधीकारी चुनाव के 10 दिन पहले कमर कस चुके थे.
दहीसर इलाके मे शिवसेना का ग्राउंड वर्क मजबुत है और कार्यकर्ताओ की कोई कमी नहीं. जबकी इससीट पर बीजेपी की स्थीती कमझोर है ( अभीभी कमझोर ही है). इस स्थीती को भांपते हुए बीजेपी ने बहार से नेताओ का जमावडा लगा दिया. लेकिन इसका इल्म किसीको नहीं हुआ और नाही अखबार या टीवी पर यह ग्राउन्ड रियालिटी दर्ज हो पाई. दहीसर सीट पर यह बहार से आए नेता एक एक बील्डींग मे जा रहे थे और मतदाताओ से मिलकर व्यक्तिगत रुप से नरेन्द्र मोदी के विचारो को समझा रहे थे. ठीक उसी समय शिवसेना के इस सिट के विधायक विनोद घोसाळकर सडक पर प्रचार कर रहे थे और यह सीट उन्हे सेफ सीट लग रही थी.

इसी सीट की बगल मे कांदीवली पूर्व की सीट है. जहां कोंग्रेस के विधायक रमेश सिंग ठाकुर आसानी से चुनाव जीतेंगे एसी हवा चल रही थी. लेकिन मामला जमिनी स्तर पर बदल रहा था. दहीसर की तरह ही यहां छोटे छोटे पॉकेट मे बडे बडे नेता गुपचुप तरीके से मिडीया से अपने आपको बचते बचाते प्रचार कर रहे थे. मसलन कांदीवली पूर्व की सीट पर बंगालीओ की एक बस्ती है. इस बस्ती मे दशहरा के दिन बंगाल के बीजेपी के इकलौते विधायक बाबुल सुप्रीयो दुर्गा माता की आरती उतारने पहुंच गए. जाहिर सी बात है कि इतना बडा गायक यदि किसी मंडल मे अपनी आवाज मे आरती गाए तो क्या होगा. वो आ गए और बंगालीओ के बीच छा गए. बस, होना क्या था, पुरी बस्ती के वोट बीजेपी को मिले. इस विधानसभा सीट पर कुल 160 सोसायटीओ की सूची बीजेपी ने बनाई थी. इन सोसायटीओ मे कौन रहता है, वह किस राज्य का है इन तमाम बातो का ध्यान रखते हुए एक एक बस्ती मे देश के अलग अलग इलाके से बीजेपी के बडे नेता आए और लोगो को मोदी फॉर्मूला समझा दिया. नतीजा बीजेपी के पक्ष मे रहा. बीजेपी का उम्मीदवार चुनाव जीत गया.

यहीं रणनिती बीजेपी की पूरे मुंबई मे रही. बीजेपी का प्रचार एक एक गली मे अलग अलग नेता कर रहे थे. शायद इसीलिए उद्धव ठाकरे ने प्रचार के इस गल्ली हमले को अफजल खान की फौज करार दे दिया.

वहीं दुसरीओर शिवसेना के पास अपना इकलौता स्टार प्रचारक है उद्धव ठाकरे. एक ही दिन होने वाले मतदान मे समय की कमी और हर एक गल्ली मे हो रहे प्रभावी प्रचार का जवाब वो वाट्सअप के माध्यम से दे रहे थे. उनके पास स्वयंघोषीत कॉपीराईट है छत्रपती शिवाजी महाराज का. चुनाव मे उन्होने छत्रपती के नाम पर वोट मांगे और बीजेपी के नेताओ की फौज को अफजल खान की फौज करार दे दिया. लेकिन यह पुरी यंत्रणा और स्टेटर्जी गलत रही. गुजरातीओ के खिलाफ प्रचार का नतीजा यह रहा की तमाम गैर मराठी वोट एकजुट हुए. लेकिन मराठी वोट अन्त तक बटे रहे. छत्रपती शिवाजी महाराज का कॉपीराईट सिर्फ शिवसेना के पास ही है यह बात तमाम मराठी मानने तो तैयार नहीं थे. शिवसेना पर पुरे चुनाव मे एक भी आरोप न लगाने वाली बीजेपी को मराठीओ के सोफ्ट कोर्नर का भी लाभ मिला. नतीजतन इस पुरे वोटो के गणीत मे बीजेपी एक अंक आगे रही. मुंबई की 15 सीट बीजेपी जीत गई.

यह आगाझ है ढाई साल बाद होने वाले बीएमसी चुनाव का. बीजेपी ने मुंबई मे शिवसेना से ज्यादा सीटे जीती है. अब यह तमाम जीते हुए विधायक काम पर लग जाएंगे और बीएमसी मे सत्ता की भागीदारी का आनंद ले रही बीजेपी अपने दम पर परचम लहराने की कोशीष करेंगी.

बहरहाल, मुंबई की गलीओ मे शांती है. नातो यहां अफजल खान की फौज है और नाही छत्रपती शिवाजी महाराज की कॉपीराईट की लडाई.




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